Zebra Fact In HIndi: जिब्रा वैसे सुनने और देखने में यह बस एक साधारण जानवर लगता है। है ना? लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इनके पूरे शरीर भर यह ब्लैक एंड वाइट धारियां आखिर होती क्यों है? क्या यह सिर्फ इनकी खूबसूरती के लिए है या फिर कुछ और? क्यों जब जेब्रा झुंड में दौड़ते हैं तो शेर जैसे खतरनाक शिकारी भी एक पल के लिए कंफ्यूज हो जाते हैं। क्या सच में इनकी धारियां आंखों का भ्रम पैदा करती है? और अगर हां तो फिर हर जेब्रा की धारियां अलग-अलग क्यों होती है?
क्या यह सिर्फ पहचान के लिए है या फिर सर्वाइवल का कोई और तरीका? आखिर इंसानों ने घोड़े और गधे को ही पालतू क्यों बनाया? जेब्रा को क्यों नहीं? क्या वजह रह गई कि यह जानवर आज भी पूरी तरह जंगली है? अब जरा यह सोचिए कि एक ऐसा जानवर जो दिखने में इतना शांत और भोला लगता है। पर उसकी एक किक ही शेर जैसे शिकारी को भी गंभीर चोट पहुंचा सकती है। क्या यह सच है या सिर्फ एक कहानी?

आज हम जानेंगे एक ऐसे जानवर के बारे में जिसकी जिंदगी का हर एक दिन एक नई परीक्षा होती है। उसके जन्म से लेकर उसके संघर्ष और उसकी हर जंग तक। तो क्या आप तैयार हैं इस काले-सफेद रहस्य को समझने के लिए? क्योंकि यह जिब्रा की अनकही कहानी है। तो चलिए देखते हैं एक जिब्रा की जिंदगी को जरा और करीब से। जिब्रा या जिब्रा जिसे अक्सर धारीधार घोड़ा या गधा भी कहा जाता है क्योंकि यह एक्वडे परिवार से आते हैं और वैज्ञानिक रूप से जिब्रा को इक्वस जीनस में रखा गया है।
यानी यह घोड़े और गधे का ही करीबी रिश्तेदार है। फर्क सिर्फ इतना है कि यह अफ्रीका के विशाल घास के मैदानों में रहने वाला जानवर है और सिर्फ दिखने में ही घास नहीं है बल्कि इसकी पूरी जिंदगी ही एक संघर्ष है। देखो, जेब्रा की सबसे बड़ी पहचान उसकी धारियां हैं। और जब जिब्रा झुंड में दौड़ते हैं तो शेर के लिए किसी एक को अपना टारगेट बनाना काफी मुश्किल हो जाता है क्योंकि जिब्रा अलग-अलग कलर के तो है नहीं कि शेर किसी एक को अपना टारगेट बना सके और उसी को दौड़ाकर पकड़ सके।

हां, एक बात कॉमन है कि जब कोई जानवर जेब्रा को पकड़ने की कोशिश करता है, खासकर शेर तो वो पहले जेब्रा के झुंड में से किसी बीमार, बूढ़े या बच्चे को ही अपना निशाना बनाता है। क्योंकि एक शेर को अच्छे से पता होता है कि एक जवान हट्ठे-इकट्ठे नर जेब्रा को पकड़ना मतलब खुद को लहूलुहान करना। वह इसलिए क्योंकि एक शेर की भागने की स्पीड लगभग 80 से 81 कि.मी. पर हावर होती है। लेकिन वे केवल थोड़ी देर तक ही इस गति से दौड़ सकते हैं।
वहीं जेब्रा की दौड़ने की स्पीड लगभग 65 से 70 कि.मी. पर हावर होती है और वह इस गति से काफी दूर तक दौड़ सकता है। लेकिन शेर के लिए जेब्रा की धारियां पहचानना पूरी तरह सही नहीं है। क्योंकि नई रिसर्च यह बताती है कि इनकी धारियां खतरनाक कीड़ों जैसे काटने वाली मक्खियों को दूर रखने में मदद करती है। और सबसे खास बात यह है कि दुनिया में कोई भी दो जिब्रा एक जैसे नहीं होते। हर एक की धारियां उनकी अपनी पहचान होती हैं।

बिल्कुल इंसानों के फिंगरप्रिंट की तरह। अब सवाल यह उठता है कि जब जिब्रा घोड़े और गधे का ही रिश्तेदार है तो इंसानों ने इसे पालतू क्यों नहीं बनाया? तो इसकी असली वजह इसका स्वभाव है। जिब्रा बहुत ज्यादा आक्रामक और अनप्रेडिक्टेबल होता है। यानी यह बिना वार्निंग के काट सकता है। जोरदार लातें भी मार सकता है। जहां घोड़े हजारों सालों से इंसानों के साथ रहना सीख गए। वहीं जेब्रा आज भी अपनी आजादी को नहीं छोड़ता।
और शायद यही कारण है कि आज तक कोई भी सभ्यता जेब्रा को पूरी तरह पालतू नहीं बना पाई। अफ्रीका के जंगलों में सभी जेब्रा एक जैसे नहीं होते। इनके भी अलग-अलग प्रकार होते हैं। क्योंकि इतने बड़े जमाने में यह मासूम सा जिब्रा अकेले तो होगा नहीं। इनके भी प्रजाति होंगे। है ना? सही समझे। आपको बता दें कि जिब्रा की तीन मुख्य स्पीशीज पाई जाती हैं। फेंस जिब्रा, माउंटेन जिब्रा और ग्रेविका जिब्रा। इन तीनों की अपनी अलग-अलग पहचान और सर्वाइवल का तरीका होता है।

फेंस जिब्रा जिसका वैज्ञानिक नाम इक्वस क्वागा है और इसे वूलचर्स जिब्रा भी कहा जाता है क्योंकि यह अफ्रीका के घनी मैदानों में बड़े झुंड में दिखते हैं और कई बार तो इनका समूह हजारों तक भी पहुंच जाता है। पेंस जेब्रा की धारियां चौड़ी और साफ होती है और इनके शरीर के नीचे हल्की भूरी या छाया जैसी धारियां भी दिखाई देती है। सेकंड पर है माउंटेन जेब्रा जिसका वैज्ञानिक नाम एक्वस जेब्रा है और यह दक्षिण पश्चिम अफ्रीका के पहाड़ी क्षेत्रों में पाए जाने वाले जेब्रा की एक विशेष प्रजाति है।
इन्हें पर्वतीय जिब्रा के नाम से ही पहचाना जाता है क्योंकि इनके पेट पर धारियां नहीं होती और गले के नीचे एक विशिष्ट गल पट्टा होता है। ये 2000 मीटर तक की ऊंचाई वाले पहाड़ी इलाकों में रहते हैं। आपको बता दें कि माउंटेन जेब्रा मैदानी जिब्रा की तुलना में थोड़े-छोटे होते हैं और इनके दो सम स्पीशीज भी होते हैं। पहला केप माउंटेन जेब्रा और दूसरा हार्टमैन माउंटेन जेब्रा। थर्ड पर है ग्रेविका जेब्रा जिसका वैज्ञानिक नाम एक्वस ग्रेवी है और इसे इंपीरियल जेब्रा भी कहा जाता है।

यह जेब्रा की तीसरी मुख्य प्रजातियों में सबसे बड़ी और दुर्लभ प्रजाति है और यह मुख्य रूप से पूर्वी अफ्रीका जैसे केन्या और इथियोपिया के अर्ध शुष्क घास के मैदानों में पाए जाते हैं। इनकी धारियां पतली और बहुत ज्यादा होती हैं और इनके बड़े-बड़े कान भी होते हैं। बिल्कुल एक गधे जैसे। ये 350 से 450 किग्रा तक वजनी हो सकते हैं और इनकी ऊंचाई 5 फीट तक हो सकती है। ये बिना पानी के 5 दिनों तक जीवित रह सकते हैं।
ग्रेवी जिब्रा बाकी जिब्रा से ज्यादा इंडिपेंडेंट और कम सोशल एनिमल है। पर दुख की बात यह है कि आज यह लुप्तप्राय है। यानी इनकी संख्या बहुत कम बची हुई है। लेकिन 1970 के दशक में जहां इनकी संख्या 15,000 से अधिक थी। लेकिन उत्तरी केन्या और इथियोपिया में रहने वाले इन जिब्रा की चरागाह क्षेत्र कम हो गया जिससे उन्हें भोजन मिलना कम हो गया। पानी की कमी हो गई, एंथ्रेक्स जैसी बीमारियां जो विशेष रूप से पालतू पशुओं के टीकाकरण के कारण फैलती हैं।

यही टीकाकरण इन जेब्रास की मृत्यु का सबसे बड़ा कारण है और अब इनकी संख्या घटकर 2000 से 2200 के आसपास हो गई है। ग्रेवि जेब्रा का गधे जैसा दिखना कोई इस्तेफाक नहीं बल्कि इसके वैज्ञानिक कारण हैं। ग्रेवि जेब्रा मैदानी जेब्रा की तुलना में अफ्रीकी जंगली गधे से अधिक निकटता से संबंधित है। इनके कान सभी जेब्रा प्रजातियों में सबसे बड़े और गोल होते हैं, जो बिल्कुल गधे या खच्चर जैसे लगते हैं।
इनके शरीर पर पतली धारियां और शरीर की सरचना इन्हें अन्य जेब्रा की तुलना में कम घोड़े जैसा और अधिक गधे जैसा दिखाती है। इसका व्यवहार भी गधे जैसा समान है। घोड़े या किसी अन्य जेब्रा प्रजाति की तरह हिनहिनाने की बजाय यह गधे की तरह ब्रे या खुरदरी आवाजें निकालता है। इसकी लंबी गर्दन, बड़े कान और विशेष शारीरिक संरचना के कारण ग्रेविका जेब्रा गधे जैसा दिखता है। सभी जिब्रास की जिंदगी जन्म से ही आसान नहीं होती।

एक न्यू बोर्न जेब्रा जन्म के कुछ ही मिनटों में खड़ा होना सीख जाता है क्योंकि इस जंगल में हर सेकंड जिंदा रहना जरूरी है। इस झुंड से भरे आबादी में मां जेब्रा अपने बच्चे को जल्द से जल्द पहचानना सिखाती है ताकि वह झुंड में खो ना जाए। जेब्रा एक शाकाहारी जानवर है और साल में सिर्फ एक ही बच्चे को जन्म देती है। इनके बच्चे को फॉल्स कहा जाता है क्योंकि ये जन्म से ही मजबूत होते हैं। सवाना के जंगलों में शेर, चीता, लकड़बग्घे जैसे शिकारी हर पल जेब्रा के पीछे लगे रहते हैं।
इस लिस्ट में क्रोकोडाइल यानी मगरमच्छ भी शामिल है। क्योंकि यह वह शातिर शिकारी है जो पानी पी रहे जेब्रा पर हर पल टूट पड़ता है और इसी अफरातफरी में किसी एक की जान भी चली जाती है। जेब्रा की जिंदगी को शायद हम कभी न समझ सकें कि कुदरत ने उन्हें इन धारियों में क्यों लपेटा? लेकिन एक बात तो साफ है। जब तक अफ्रीका के मैदानों में यह काली सफेद लकीरें दौड़ रही हैं तब तक कुदरत का सबसे बड़ा रहस्य जिंदा है।

अगली बार जब आप एक जेब्रा को देखें तो सिर्फ एक जानवर को ही मत देखिएगा। आप देखना उस भ्रम को जिसने मौत को भी सदियों से चकमा देता आ रहा है और शायद इसीलिए यह सिर्फ एक जानवर नहीं बल्कि सर्वाइवल की एक मिसाल है।